ऋषिकेश, 8 अक्टूबर। भारतीय सिनेमा के महान अभिनेता, संवेदनशील व्यक्तित्व और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाले नाना पाटेकर के निधन से देश ने एक विलक्षण कलाकार ही नहीं, बल्कि एक ऐसे संवेदनशील इंसान को खो दिया है, जिनकी कला और कर्म दोनों ने असंख्य हृदयों को स्पर्श किया। परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आज व्यथित हृदय और नम आँखों से प्रिय नाना पाटेकर जी को परमार्थ निकेतन Parmarth Niketan से भावांजलि एवं विनम्र श्रद्धांजलि। माँ गंगा के पावन तट पर उनके साथ बिताए आत्मीय क्षण आज स्मृतियों में और भी जीवंत होकर सामने आ रहे हैं।
उनका सहज अपनापन, सरल व्यवहार और बिना किसी आडंबर के हृदय से जुड़ जाने वाली आत्मीयता सदैव स्मृतियों में बनी रहेगी। पूज्य स्वामी ने कहा कि नाना पाटेकर जी उन कलाकारों में से थे जिन्होंने अभिनय को केवल किया नहीं, बल्कि उसे जिया। पाँच दशकों से अधिक की उनकी कला-यात्रा में उन्होंने अनेक विविध और चुनौतीपूर्ण चरित्रों को जीवन दिया, पर उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि पर्दे पर चरित्र दिखाई देता था और कलाकार पीछे छूट जाता था। उनकी आवाज में एक अलग प्रभाव था, संवादों में गहराई थी और उनकी आँखें बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती थीं। उनका अभिनय केवल मनोरंजन नहीं था; वह जीवन का आईना था। उनके अनेक किरदारों में समाज की सच्चाई, मानवीय संघर्ष, रिश्तों की जटिलता और जीवन की कठोर वास्तविकताएँ दिखाई देती थीं।
उन्होंने दर्शकों को केवल हँसाया या रुलाया नहीं, बल्कि सोचने, प्रश्न करने और अपने आसपास की दुनिया को संवेदनशील दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित किया। यही किसी महान कलाकार की सबसे बड़ी पहचान होती है कि उसकी कला पर्दे की सीमा से आगे बढ़कर समाज और संवेदना को स्पर्श करे। नाना जी की पहचान केवल एक अभिनेता के रूप में नहीं थी। वे भीतर से अत्यंत संवेदनशील, सरल और अपनी जड़ों से जुड़े हुए इंसान थे। उन्होंने प्रसिद्धि को कभी मानवीय सरोकारों से ऊपर नहीं रखा। नाम फाउंडेशन के माध्यम से सूखे से जूझ रहे किसान परिवारों की सहायता करना और उनके जीवन में आशा का संचार करना हो, या देश की सीमाओं पर जाकर हमारे वीर जवानों के बीच खड़े होकर उनका मनोबल बढ़ाना—उन्होंने सामाजिक दायित्व को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म और सेवा के माध्यम से अभिव्यक्त किया।उनकी संवेदनशीलता उन लोगों तक भी पहुँची, जिनकी आवाज अक्सर समाज के शोर में दब जाती है। यही कारण है कि वे केवल एक सफल अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक जागरूक, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक के रूप में भी सम्मानित रहे। ख्याति के शिखर पर पहुँचने के बाद भी उनका अपनी मिट्टी, अपने लोगों और अपनी वास्तविकताओं से जुड़ाव बना रहा। परमार्थ निकेतन के साथ उनका आत्मीय संबंध भी हमारी स्मृतियों की अमूल्य धरोहर है।
उनका परमार्थ निकेतन आना, माँ गंगा की आरती में सहभागी बनना और गंगा तट पर आत्मीय क्षण बिताना परमार्थ परिवार के लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा। माँ गंगा की पावन धारा के समीप उनकी सहज उपस्थिति, उनकी आत्मीयता और उनके साथ हुई बातचीत आज स्मृतियों में और भी गहरी होकर उतर रही है। गंगा तट पर बिताए वे पल अब केवल बीते हुए क्षण नहीं हैं; वे परमार्थ परिवार की भाव-संपदा हैं— ऐसी स्मृतियाँ जिन्हें समय कभी धुंधला नहीं कर सकता। आज नाना जी हमारे बीच देह रूप में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनके निभाए चरित्र, उनकी कला की गूँज, उनकी संवेदनशीलता और उनके सामाजिक कार्य आने वाली पीढ़ियों तक उन्हें जीवंत रखेंगे। कुछ कलाकार पर्दे से विदा होते हैं, लेकिन हृदय से कभी विदा नहीं होते।
नाना पाटेकर जी भी उन्हीं विरल कलाकारों में से एक हैं।उनका जाना भारतीय कला-जगत में ऐसी रिक्तता छोड़ गया है जिसे भर पाना संभव नहीं। किंतु उन्होंने अपनी कला, अपने कर्म और अपनी संवेदनाओं से जो विरासत छोड़ी है, वह सदैव हमारे साथ रहेगी। अलविदा नाना… आप पर्दे से विदा हुए हैं, स्मृतियों से नहीं।
आपकी कला जीवित रहेगी, आपकी संवेदना जीवित रहेगी, और आपके साथ बिताए वे आत्मीय पल सदैव हमारे हृदय में जीवित रहेंगे। माँ गंगा से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा उनके परिवारजनों, प्रियजनों और असंख्य प्रशंसकों को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति, धैर्य और संबल प्रदान करें।




