Consulting Editor: M. Faheem 'Tanha'
देहरादून। (Big News Today) – उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय राजीव भवन में इन दिनों राजनीतिक मुद्दों से ज्यादा चर्चा एक टेबल की दिशा को लेकर है। यह वही मीडिया कक्ष है, जहां से पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता और मीडिया कमेटी से जुड़े पदाधिकारी कांग्रेस का आधिकारिक पक्ष मीडिया के सामने रखते हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यहां टेबल की दिशा शायद अभी भी एक नहीं हो पाई है।
सूत्रों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से चर्चा का विषय बना हुआ है कि मीडिया कक्ष में प्रवक्ताओं के बैठने वाली टेबल का रुख एक-दो दिन के अंतर से अक्सर बदलता रहता है। किसी दिन वह दक्षिण की ओर मुंह किए दिखाई देती है तो किसी दिन पूर्व दिशा की तरफ। यह बदलाव कोई प्रशासनिक पुनर्व्यवस्था है, वास्तु का प्रयोग है या फिर संगठन के भीतर मौजूद अदृश्य ध्रुवीकरण का दृश्य प्रतीक—इस पर तरह-तरह की चर्चाएं होती रहती हैं।
कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ताओं में गरिमा दसौनी, शीशपाल बिष्ट, डॉ. प्रतिमा सिंह, सुजाता पॉल, मोहन काला और आशीष नौटियाल समेत अन्य नेता शामिल हैं, जो नियमित रूप से पार्टी का पक्ष रखते हैं। लेकिन पार्टी के भीतर ही यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि मीडिया कक्ष की टेबल को भी स्थायी दिशा नसीब नहीं हो पा रही है।
"काफी वर्षों से मीडिया कक्ष की टेबल की जो दिशा रही है हम उसी प्रकार बैठते हैं। हमें पहले की व्यवस्था में ही बैठने में सुविधा रहती है क्योंकि टेबल की दोनों तरफ से किसी भी चेयर पर बैठा जा सकता है, इसमें आपसी मतभेद जैसा कुछ नहीं है।" - डॉ. प्रतिमा सिंह, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस
बताया जाता है कि वर्षों तक टेबल एक निश्चित दिशा में रही, लेकिन बाद में नए प्रवक्ताओं के आने के बाद उसका रुख बदला गया। इसके बाद से मानो दिशा परिवर्तन एक परंपरा बन गई। पुराने और नए प्रवक्ताओं के बीच इस व्यवस्था को लेकर सहमति नहीं बन सकी और अब अवसर तथा पसंद के अनुसार टेबल का रुख बदलने का सिलसिला जारी रहता है।
कुछ लोग इसे वास्तु शास्त्र से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि मीडिया संवाद के लिए बैठने की दिशा शुभ-अशुभ प्रभाव डालती है। लेकिन कांग्रेस के गलियारों में चल रही चर्चाएं इससे कहीं आगे जाती हैं। वहां इसे संगठन के भीतर मौजूद अलग-अलग समूहों की प्रभाव-प्रदर्शन से जोड़कर देखा जाता है।
"मीडिया कक्ष में लगी टेबल का रुख काफी पुराना है, इससे मीडिया कर्मियों को भी सामने अच्छा स्पेस मिल जाता है। इसमें वास्तु की अड़चन जैसा कुछ नहीं है, हम पहले की व्यवस्था के हिसाब से ही बैठते हैं।" - गरिमा दसौनी, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस .
विडंबना यह है कि एक ओर कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा लगातार संगठन के नेताओं, पदाधिकारियों और अनुषांगिक संगठनों को एकजुट होकर काम करने, बेहतर समन्वय स्थापित करने और 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटने का संदेश दे रही हैं। दूसरी ओर प्रदेश मुख्यालय के मीडिया कक्ष में एक टेबल की दिशा तक सर्वसम्मति से तय नहीं हो पा रही।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। जब संगठन का मीडिया कक्ष ही रोज नई दिशा तलाशता दिखाई दे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पार्टी की राजनीतिक दिशा भी उतनी ही स्पष्ट है, जितनी मंचों से बताई जाती है।
दरअसल, यहां मुद्दा केवल फर्नीचर का नहीं है। मुद्दा उस संदेश का है जो संगठन के भीतर और बाहर जाता है। यदि मीडिया कक्ष की टेबल भी अलग-अलग पसंद और आग्रहों के बीच झूलती रहे, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह व्यक्तिगत अहंकारों के टकराव का संकेत नहीं है? क्या यह संगठनात्मक अनुशासन पर व्यक्तिगत पसंद की प्राथमिकता नहीं दर्शाता?
कांग्रेस के भीतर चर्चा करने वाले कुछ लोग तो यहां तक तंज कसते हैं कि राजीव भवन का मीडिया कक्ष शायद उत्तराखंड कांग्रेस का सबसे सक्रिय ‘राजनीतिक कंपास’ बन चुका है, जो समय-समय पर अपनी दिशा बदलकर यह संकेत देता रहता है कि संगठन में सर्वसम्मति का रास्ता अभी भी तलाशा जा रहा है।
सवाल यह नहीं है कि टेबल पूर्व की ओर रहे या दक्षिण की ओर। सवाल यह है कि क्या संगठन के भीतर राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा एक है? क्योंकि जब पार्टी 2027 की लड़ाई के लिए एकजुटता का संदेश दे रही हो, तब उसके मुख्यालय के मीडिया कक्ष से उठती ऐसी चर्चाएं अनायास ही उस संदेश की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर देती हैं। आखिरकार, लोकतंत्र में दिशा केवल फर्नीचर की नहीं, संगठन की भी मायने रखती है।



