Big News Today (लेखक: डॉ. सुशील उपाध्याय): 14 जून, 2026 को नवभारतटाइम्स.कॉम पर यूजीसी नेट परीक्षा को लेकर एक लेख छपा है, जिसका शीर्षक है – ‘UGC NET में तुक्का लगाने का स्मार्ट तरीका क्या है? 10 बार नेट पास कर चुके एक्सपर्ट से जानें।’ लेख का इंट्रो है – ‘यूजीसी नेट एग्जाम 22 जून से शुरू होने वाला है। लास्ट मोमेंट पर एक्सपर्ट्स के टिप्स काफी काम आ सकते हैं। कई उम्मीदवार कुछ प्रश्नों को लेकर तुक्का लगाते हैं। लेकिन तुक्का लगाने का भी एक स्मार्ट तरीका होता है।’
नवभारतटाइम्स.कॉम का यह लेख केवल एक समाचार या परीक्षा-पूर्व सलाह नहीं है। वस्तुतः यह उस व्यापक परिवर्तन का संकेतक है जो पिछले कुछ वर्षों में यूजीसी नेट परीक्षा की प्रकृति में आया है।अब, वास्तविक प्रश्न है कि क्या यूजीसी नेट की वर्तमान संरचना उच्च शिक्षा के लिए उपयुक्त चयन-प्रक्रिया सिद्ध हो रही है।
तुक्का लगाने पर केंद्रित इस लेख के पीछे छिपे अर्थ को पकड़ना हो तो वह ये है कि यूजीसी नेट जैसा प्रतिष्ठित एग्जाम अब तुक्का लगाकर पास करने वाले एग्जाम में परिवर्तित होता दिख रहा है। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि आज से 15-16 वर्ष पहले तक, जब इस एग्जाम को ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव की मिली-जुली पद्धति से आयोजित किया जाता था, तब इसकी प्रतिष्ठा संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के समान थी। लेकिन इसे मल्टीपल चॉइस पद्धति का नेगेटिव मार्किंग रहित एग्जाम बना देने से अनुमान आधारित रणनीतियों पर निर्भरता बढ़ गई है।
इस लेख में डॉ. अमित कुमार का जिक्र किया गया है, जो 10 अलग-अलग विषयों में यूजीसी नेट पास कर चुके हैं। यकीनन यह किसी एक व्यक्ति की बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अगर इस एग्जाम की संरचना और महत्ता की दृष्टि से देखें तो यह बताती है कि यूजीसी नेट को 10 बार भी अलग-अलग विषयों में उत्तीर्ण किया जा सकता है। अर्थात यह परीक्षा किसी विषय की वैसी व्यापक गहराई को जांचने-परखने में सक्षम नहीं दिखती, जिसकी आवश्यकता उच्च शिक्षा के लिए अनिवार्य है। (हालांकि, एक गंभीर प्रश्न यह है कि डॉ. अमित कुमार ने 10 विषयों में पीजी उपाधि प्राप्त करने में कितना समय लगाया गया होगा और क्या वास्तव में ये सभी उपाधियां प्रचलित नियमों के अनुरूप प्राप्त की गई हैं अथवा नहीं! अन्यथा, ये सब उपक्रम यूजीसी के नेट एग्जाम को धता-बता देने तक सीमित है!)
वस्तुत:, जब कोई व्यक्ति जेआरएफ अथवा नेट परीक्षा उत्तीर्ण करता है, तो उसका लक्ष्य उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षक एवं शोध कार्य से जुड़ा होता है। यदि तुलना की दृष्टि से देखें तो एक पहला सवाल यह भी है कि क्या देश में कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने संघ लोक सेवा आयोग या लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अलग-अलग विषयों को आधार बनाकर 10 या अधिक बार सफलता प्राप्त की हो? वास्तव में ऐसा व्यक्ति ढूंढना कठिन होगा। लेकिन, यूजीसी नेट में ऐसा संभव हो पा रहा है। और बात केवल 10 विषयों में यूजीसी नेट पास करने की नहीं है, बल्कि अब ऐसे अनेक युवा दिखाई दे रहे हैं जो अलग-अलग प्रकृति के तीन से पांच विषयों में यूजीसी नेट पास कर चुके हैं। अब, यदि ऐसे उदाहरणों की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या यूजीसी नेट परीक्षा वास्तव में विषयगत विशेषज्ञता को माप रही है अथवा मुख्यतः परीक्षा-कौशल और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने की क्षमता को।
गहन दृष्टि से देखें यूजीसी ने अपनी परीक्षा को इतना सरल बना दिया है कि विषयगत गहराई की तुलना में परीक्षा-कौशल का महत्व बढ़ता हुआ दिखाई देता है।नवभारतटाइम्स.कॉम का यह लेख भी इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है। तुक्का लगाने के इस खेल को स्मार्ट एलिमिनेशन बताया गया है। यानी आपको विषय का गहन और गंभीर ज्ञान होने की बजाय उस तकनीक का पता होना चाहिए, जिसके आधार पर बहुविकल्पीय उत्तरों में से उन उत्तरों को हटा दें, जो गलत हैं या हो सकते हैं। यानी सही उत्तर जानने की बजाय यह अनुमान लगाया जाए कि गलत क्या है।
निश्चित रूप से एलिमिनेशन तकनीक को पूर्णतः तुक्का नहीं कहा जा सकता। इसके लिए विषय का कुछ आधारभूत ज्ञान आवश्यक होता है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि एलिमिनेशन तकनीक विषय की गहरी समझ, विश्लेषणात्मक क्षमता और अकादमिक परिपक्वता का विकल्प नहीं हो सकती। किसी परीक्षा की गुणवत्ता इस बात से निर्धारित होती है कि वह सही उत्तर पहचानने की क्षमता का परीक्षण करे और विषय की व्यापक समझ का भी। जिस परीक्षा के जरिए भविष्य के सहायक प्रोफेसरों का चयन किया जा रहा हो, जो बाद में प्रोफेसर या इससे भी बड़े पदों पर पहुंचेंगे, उस परीक्षा को मुख्यतः अनुमान आधारित रणनीतियों पर निर्भर बना देना चिंता का विषय है।
यदि यूजीसी को ऐसा लगता है कि विस्तृत और लिखित उत्तरों वाली परीक्षा की मूल्यांकन प्रक्रिया कठिन है और उसमें गलतियां होने की आशंका अधिक है, तो बेहतर यह होता कि इस परीक्षा में भी सीएसआईआर-नेट परीक्षा के समान नेगेटिव मार्किंग का प्रावधान किया जाता। इससे अनुमान आधारित उत्तरों की प्रवृत्ति कम होती, कट-ऑफ अधिक वास्तविक बनती और विषय-ज्ञान तथा परीक्षा-रणनीति के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता।
इस अनुमान आधारित अप्रोच के कारण अब अनेक कोचिंग संस्थान यूजीसी नेट की तैयारी को भी खूब अच्छे से बेच पा रहे हैं, जबकि ऑब्जेक्टिव एवं सब्जेक्टिव मिले-जुले माध्यम की परीक्षा के दौर में कोचिंग संस्थानों के लिए यूजीसी नेट परीक्षा क्लियर करा देने का दावा करना इतना आसान नहीं था। अब, यदि वास्तव में यूजीसी नेट परीक्षा की प्रतिष्ठा और इसके उच्च उद्देश्य के साथ परिणाम के जुड़ाव को बनाए रखना है, तो यूजीसी को इसे केवल पीजी सिलेबस तक सीमित नहीं रखना चाहिए। बल्कि इसमें प्रत्येक विषय के यूजी और पीजी दोनों पाठ्यक्रमों के सिलेबस को शामिल करना चाहिए। इसके साथ ही यह भी विचार किया जा सकता है कि परीक्षा का एक हिस्सा पुनः वर्णनात्मक स्वरूप में लाया जाए। उदाहरण के लिए 70 प्रतिशत वस्तुनिष्ठ और 30 प्रतिशत वर्णनात्मक प्रश्नों का मॉडल अपनाया जा सकता है। जेआरएफ अभ्यर्थियों के लिए शोध-अभिरुचि, आलोचनात्मक चिंतन और अकादमिक लेखन क्षमता को परखने वाली पृथक व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है।
साथ ही पहले प्रश्नपत्र को, जो अलग-अलग 10 उपक्षेत्रों को शामिल करते हुए गठित किया गया है, नए सिरे से इस प्रकार निर्धारित किया जाना चाहिए कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मैंडेट को भी उसका हिस्सा बनाया जा सके। ध्यान देने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दृष्टिगत देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में सेलेबस से लेकर संस्थागत संरचना औरu प्रक्रियाओं में व्यापक बदलाव किए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक यूजीसी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के इन परिवर्तनों के अनुरूप नेट परीक्षा में व्यापक बदलाव करने पर विचार नहीं किया है! चूंकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को उच्च शिक्षा क्षेत्र का भी आधारभूत दस्तावेज माना जा रहा है, तो बहुविषयक शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा, डिजिटल शिक्षण, अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट, शोध एवं नवाचार जैसे विषयों को भी नेट परीक्षा की संरचना में समुचित स्थान मिलना चाहिए।
इस परीक्षा को वर्ष में दो बार आयोजित किए जाने का भी कोई विशेष औचित्य नहीं दिखता, क्योंकि प्रत्येक छमाही में जितने युवाओं को यूजीसी नेट क्वालीफाइड घोषित किया जाता है, उनकी तुलना में देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में नाममात्र के ही पद उपलब्ध होते हैं। साल में दो बार यूजीसी और राज्य सरकारों के स्तर पर आयोजित किए जाने वाले स्टेट एलिजिबिलिटी टेस्ट के जरिए हर वर्ष बड़ी संख्या में नेट या सेट उत्तीर्ण युवा बेरोजगारों की पंक्ति को और मजबूत कर देते हैं। स्थिति यह है कि प्रत्येक वर्ष नेट और सेट के माध्यम से एक लाख से ज्यादा नए पात्र अभ्यर्थी जुड़ते जाते हैं, जबकि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में रिक्त पदों की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ती। परिणामस्वरूप पात्रता और रोजगार के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।
यह ठीक है कि इस परीक्षा को संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं जैसा कठिन नहीं बनाया जा सकता, लेकिन इसमें इतना बदलाव तो किया ही जा सकता है कि शैक्षिक और अकादमिक दुनिया में इसका एक न्यूनतम स्थान बना रहे और कोई मीडिया प्लेटफार्म अथवा कोचिंग संस्थान इसे अनुमान आधारित रणनीतियों के सहारे पास होने वाले एग्जाम की तरह प्रस्तुत न कर सके। यह सच है कि किसी भी परीक्षा की प्रतिष्ठा केवल उसकी कठिनाई से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसकी चयन-क्षमता से निर्धारित होती है। यदि यूजीसी नेट वास्तव में उच्च शिक्षा के भावी अध्यापकों और शोधकर्ताओं का चयन करना चाहती है, तो उसे ऐसी परीक्षा बनना होगा जो अनुमान लगाने की क्षमता नहीं, बल्कि विषयगत गहराई, विश्लेषण और अकादमिक परिपक्वता को परखे।
(लेखक: Dr. सुशील उपाध्या



