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हिमालय का ‘मर्यादित विद्रोही’: भजन सिंह ‘सिंह’ और गढ़वाली साहित्य का स्वर्णिम सिंह-युग

Dehradun Uttarakhand






■ लेखक: शीशपाल गुसाईं

हिमालय केवल बर्फ की चोटियों और कल-कल बहती नदियों का समुच्चय नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जीवंत चेतना है जिसने समय-समय पर उन ऋषियों, मनीषियों और क्रांति-पुत्रों को जन्म दिया है, जिन्होंने समाज की दिशा बदल दी। इसी महान परंपरा की एक तेजस्वी कड़ी का नाम है— भजन सिंह ‘सिंह’। गढ़वाली साहित्य के आकाश में एक ऐसे ध्रुवतारे, जिनकी चमक ने न केवल भाषा को संस्कारित किया, बल्कि समाज के भीतर पैठे अंधविश्वास और जड़ता के अंधकार को भी अपनी लेखनी की मशाल से चुनौती दी।

इतिहास गवाह है कि किसी भी भाषा का उत्थान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उस भाषा को जीने वाले ‘युग-पुरुष’ के संकल्प से होता है। भजन सिंह ‘सिंह’ गढ़वाली साहित्य के वही ‘युग-प्रवर्तक’ हैं, जिनके कालखंड को निर्विवाद रूप से “सिंह युग” की संज्ञा दी गई।

■ संघर्ष की भट्टी में तपा कंचन

29 अक्टूबर 1905 को पौड़ी गढ़वाल के कोट ब्लॉक के  सितोनस्यूं पट्टी के ग्राम कोटसाड़ा में रतन सिंह बिष्ट (जो ‘कफोला’ वंश के थे और पेशे से एक समर्पित अध्यापक थे) श्रीमती जानकी देवी के घर में जन्मे भजन सिंह का जीवन किसी महाकाव्य के नायक जैसा रहा। नियति की क्रूरता देखिए कि जन्म लेते ही माता का साया छिन गया, लेकिन नियति शायद उन्हें कठोरता की आंच में तपाकर कुंदन बनाना चाहती थी। बुआ के स्नेह और पिता के कठोर अनुशासन ने उनके भीतर वह रीढ़ तैयार की, जो आगे चलकर सामाजिक कुरीतियों के सामने कभी नहीं झुकी।

एक सैनिक के रूप में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती होना और फिर वहां से पेशावर कांड के नायक चंद्र सिंह गढ़वाली के प्रेरणा स्रोत बनना, यह दर्शाता है कि सिंह साहब के भीतर एक प्रज्वलित राष्ट्रभक्त निवास करता था। उन्होंने बंदूक की नली से निकलने वाले अनुशासन और कलम की नोक से निकलने वाली संवेदना का वह दुर्लभ संगम प्रस्तुत किया, जो बिरले ही देखने को मिलता है।

■ ‘उत्तराखंडी कबीर’: मर्यादा और विद्रोह का अनूठा संगम

साहित्यिक आलोचकों ने उन्हें “मर्यादित विद्रोही” कहा है। यह शब्द उनके व्यक्तित्व की सबसे सटीक व्याख्या है। उनका विद्रोह कबीर की तरह प्रखर था, लेकिन उसमें एक संयम था, एक संस्कार था। वे जब कन्या विक्रय जैसी अमानवीय प्रथाओं पर प्रहार करते थे, तो उनकी कलम लहू नहीं, बल्कि समाज को झकझोरने वाला वह पानी उलीचती थी जो सोई हुई चेतना को जगा दे।
उन्हें “उत्तराखंड का कबीर” कहना अतिशयोक्ति नहीं है। जिस प्रकार कबीर ने मध्यकाल में पाखंड पर चोट की, ठीक उसी प्रकार भजन सिंह ने 20वीं सदी के मध्य में गढ़वाल के पर्वतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध ‘सिंहनाद’ किया। उनकी रचनाओं में निर्बल और असहायों के प्रति जो करुणा है, वही उन्हें एक महान सुधारक की श्रेणी में खड़ा करती है।

■  सिंहनाद: गढ़वाली अस्मिता का घोषणापत्र

1930 में जब ‘सिंहनाद’  गूंजा, तो वह केवल कविताओं का संग्रह नहीं था, बल्कि वह गढ़वाली जनमानस की सोई हुई अस्मिता का जागृति-गीत था। उन्होंने गढ़वाली कविता को लोकगीतों की चौखट से बाहर निकालकर शास्त्रीय प्रौढ़ता दी। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि हमारी मातृभाषा केवल ‘खुदेड़ गीतों’ की भाषा नहीं है, बल्कि इसमें गज़ल, छंद और रस की वह सामर्थ्य है जो विश्व साहित्य से आंख मिला सकती है। उनकी कृति ‘आर्यों का आदि निवास मध्य हिमालय’  उनके गहरे शोधपरक दृष्टिकोण का प्रमाण है। उन्होंने अकाट्य प्रमाणों के साथ यह स्थापित किया कि यह देवभूमि केवल तीर्थाटन का केंद्र नहीं, बल्कि सभ्यता की आदि स्थली है।

■ हिमालय के इस ऋषि का ऋण

आज जब हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी भाषा और संस्कृति को बिसरा रहे हैं, तब भजन सिंह ‘सिंह’ के विचार किसी लाइटहाउस की तरह हमें रास्ता दिखाते हैं। 10 अक्टूबर 1996 को भले ही उनका पार्थिव शरीर शांत हो गया, लेकिन उनकी ‘सिंह सतसई’ के दोहे और ‘सिंहनाद’ की गूंज आज भी हिमालय की घाटियों में जीवंत है।

उत्तराखंड भाषा संस्थान द्वारा उनके नाम पर दिया जाने वाला पुरस्कार वास्तव में उनकी उस विरासत को नमन है, जिसने गढ़वाली को एक साहित्यिक गरिमा प्रदान की। हमें गर्व होना चाहिए कि हम उस धरती के वासी हैं जहां भजन सिंह ‘सिंह’ जैसे महामानव ने जन्म लिया। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार थे, एक आंदोलन थे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक शाश्वत प्रेरणा रहेंगे।

■ “खुदेड़-बेटी”: एक विरह और वात्सल्य का सजीव चित्रण

गढ़वाली समाज में ‘खुदेड़’ (याद) एक ऐसा भाव है जो पहाड़ की नारी के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। भजन सिंह जी ने इसे जिस सादगी और गहराई से लिखा, वह आंखों में पानी ला देता है।

मूल गढ़वाली अंश:  “डांडा-कांडा फूलि गैनी, बुरांश-पय्यों खिली गैनी।
मैं अबला बिचारी की, खुदेड़ सुधि नि ऐनी।।”

सरल भावार्थ: बेटी कहती है कि पहाड़ों की चोटियां फूलों से लद गई हैं, बुरांश और पय्यों (पद्म) खिल उठे हैं। वसंत आ गया है, प्रकृति सज गई है, लेकिन मुझ अबला की सुध लेने कोई नहीं आया। मेरा मायका (मुलुक) मुझे बहुत याद आ रहा है।

साहित्यिक विशेषता: सिंह साहब ने इस कविता में केवल एक स्त्री की पीड़ा नहीं लिखी, बल्कि पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और उस दौर के सामाजिक ढांचे में एक बेटी के एकाकीपन को उकेरा है। इसमें जो ‘मर्यादित विद्रोही’ है, वह समाज से सवाल करता है कि क्या ऋतुओं का परिवर्तन केवल फूलों के लिए है? क्या उन बेटियों के जीवन में वसंत कभी आएगा जो मीलों दूर अपने मायके की राह तकती रहती हैं? 

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