वैलेंटाइन सिर्फ कुछ दायरों तक न रहे, लेकिन मर्यादा कायम रहना चाहिए देहरादून। वैसे तो प्यार के इजहार के लिए कोई दिन नहीं होता, लेकिन एक दूसरे को चाहने वाले हर साल 14 फरवरी का बेसब्री से इंतजार करते हैं। जिसे वैलेंटाइन डे कहा जाता है। इसे प्यार करने वालों का दिन माना जाता है। कपल्स को बड़ी ही बेसब्री से इस खास दिन का इंतजार रहता है। वैलेंटाइन डे की शुरुआत को लेकर कई किवदंतियां रही हैं। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक रोम में तीसरी सदी के दौरान वैलेंटाइन नाम के एक पादरी थे। इस दौरान वहां के शासक क्लैडियस द्वितीय ने अविवाहित युवाओं को बेहतर योद्धा मानते हुए युवाओं को शादी करना गैरकानूनी करार दे दिया। वैलेंटाइन ने इसे अन्यायपूर्ण माना और प्यार करने वाले जोडों की चुपचाप चर्च में शादी कराना शुरू कर दिया। कुछ दिनों बाद राजा क्लैडियस को इसकी भनक लग गई और उसने वैलेंटाइन की हत्या करवा दी। करीब 270 ईसवी पूर्व उनकी मौत या दफनाने के दिन को ही वेलेंटाइन डे के तौर पर मनाया जाने लगा। वैलेंटाइन डे को लार सैंट वेलेनटाइन से जोड़ा जाता है। लेकिन भारत में इस दिन का एक अलग संदर्भ सामने आता है। वैलेंटाइन डे की शुरुआत यूरोप में हुई थी। भारत में यह त्योहार 1990 के दशक के बाद ज्यादा लोकप्रिय हुआ। लेकिन मसूरी की यह कहानी बताती है कि 19वीं सदी में भी यहां प्रेम को 14 फरवरी से जोड़कर देखा गया था। इसलिए कुछ लोग इसे भारत में वैलेंटाइन डे की पहली झलक मानते हैं। मसूरी का नाम एक ऐसे प्रेम पत्र से जुड़ा है, जो 1843 में लिखा गया था। 14 फरवरी 1843 को मसूरी में रह रहे एक ब्रिटिश शिक्षक मोगर मांक ने अपनी बहन को पत्र लिखा। इस खत में उन्होंने एलिजाबेथ लुईन नाम की युवती से अपने प्रेम का जिक्र किया था। बताया जाता है कि यह पत्र बाद में 'मसूरी मर्चेंट द इंडियन लेटर्स' नाम की किताब में प्रकाशित हुआ। करीब 150 साल बाद इन पुराने पत्रों का जिक्र सामने आया और यह कहानी चर्चा में आई। मोगर मांक ब्रिटेन से मसूरी पढ़ाने आए थे। परिवार से दूर रहने के कारण वह अकेलापन महसूस करते थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात एलिजाबेथ से हुई। पहले दोस्ती और फिर प्यार का यह रिश्ता धीरे-धीरे गहरा हुआ। शादी के बाद मोगर अपनी पत्नी को लेकर ब्रिटेन जाना चाहते थे, लेकिन रास्ते में बीमारी के कारण उनकी मौत हो गई। एलिजाबेथ वापस मसूरी लौट आईं और यहीं रहकर पढ़ाने लगीं। उनकी प्रेम कहानी अधूरी रह गई, लेकिन खत ने इसे अमर बना दिया। 14 फरवरी को मसूरी में खास रौनक रहती है। होटल और कैफे स्पेशल डिनर रखते हैं। कपल्स माल रोड और पहाड़ी व्यू प्वाइंट पर समय बिताते हैं। वैलेंटाइन के लिए देहरादून में एमडीडीए पार्क, गुच्चू पानी, डियर पार्क, लच्छीवाला पिकनिक स्पॉट के तौर पर और टपकेश्वर, संतला देवी मंदिरों में दर्शन के लिए भी युगल आते हैं। कुछ होटल्स में भी वेलेंटाइन डिनर होते हैं। हालांकि वैलेंटाइल डे को भारतीय संस्कृति के विरुद्घ बताकर शिवसेना-बजरंग दल इसका विरोध भी करते आए हैं। वैसे वेलेंटाइन से मनाने में बुराई नहीं है। मगर जब मर्यादा टूटती है तो आपत्तिजनक हो जाता है। समय बदल रहा है, युवाओं की सोच बदल रही है। वैलेंटाइन सिर्फ कुछ दायरों तक न रहे, लेकिन मर्यादा कायम रहना चाहिए। संत वैलेंटाइन का संदेश पूरे मानव मात्र के लिए था। प्रेम भाई-बहन, माता-पिता सभी रिश्तों में होता है, लेकिन यह लड़के-लड़कियों के बीच सिमटता जा रहा है। प्रेम बुरी बात नहीं है, लेकिन मायने रखता है कि आप अभिव्यक्ति कैसे कर रहे हैं। हर रिश्ते को प्रेम का नाम नहीं दे सकते।


